स्वर्ण भस्म (Gold Ash)
स्वर्णप्राशन ( Suvarna Prashana ) कैसे बनती है आयुर्वेदिक गुण और कर्म
स्वर्ण भस्म को आयुर्वेद में हजारों सालों से दवाई के रूप में प्रयोग किया जा रहा है आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म का अपना एक विशेष स्थान है. यह शरीर में ताक़त देने के साथ साथ मानसिक शक्ति में सुधार करने वाली औषधी कहलाती है. यह हृदय (Heart) और मस्तिष्क (Mind) को विशेष रूप से ताक़त प्रदान करती है. आयुर्वेद में हृदय रोगों और मस्तिष्क की निर्बलता जैसे रोगों में स्वर्ण भस्म को सर्वोत्तम माना गया है.
स्वर्ण भस्म कैसे बनायी जाती है
स्वर्ण को आभूषण बनाने के साथ साथ औषधी की तरह भी प्रयोग किया जाता रहा हैं. आयुर्वेद में स्वर्ण जैसी मूल्यवान धातु की रासयनिक विधि से भस्म बनाई जाती है जो की सोने की ही तरह बहुत मूल्यवान है. सोने की भस्म को स्वर्ण भस्म कहते हैं.
स्वर्ण भस्म को आयुर्वेद (रसतरंगिणी) में बताये विस्तृत विवरण अनुसार ही बनाया जाता है. स्वर्ण भस्म को बनाने के लिए शुद्ध सोने को शोधन और मारण प्रक्रिया से गुजारा जाता है तब कही जा कर स्वर्ण भस्म बनती है
स्वर्ण भस्म (Gold Ash) कैसे बनती है आयुर्वेदिक गुण और कर्म
स्वर्ण के शोधन के लिए : तिल तेल, तक्र, कांजी, गो मूत्र और कुल्थी के काढ़े का प्रयोग किया जाता है.
स्वर्ण के मारण के लिए : पारद, गंधक अथवा मल्ल, कचनार और तुलसी को मर्दन के लिए प्रयोग किया जाता है.
स्वर्ण भस्म में सोने की कितनी मात्रा होती है
सोने को जब विभिन्न रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है तो स्वर्ण की भस्म बनती है इसमें सोना बहुत ही सूक्ष्म रूप में (नैनो मीटर 10-9) विभक्त होता है. इसके अतिरिक्त इसके शोधन और मारण में बहुत सी वनस्पतियाँ का भी प्रयोग किया जाता हैं. जिस कारणों से स्वर्ण भस्म शरीर की कोशिकायों में सरलता से प्रवेश कर जाती हैं और बहुत से रोगों में लाभ भी देती है क्योंकि वनस्पतियाँ के गुण धर्म मिलने का बाद यह शरीर का हिस्सा बन जाती हैं.
चरक, शुश्रुत, कश्यप सभी ने स्वर्ण भस्म के लिए अत्यंत हितकर बताया है. छोटे बच्चों को स्वर्ण प्राशन , Swarna Bindu Prashana कराने की भी परम्परा रही है जो की आज भी जारी है. महाराष्ट्र, गोवा, कर्णाटक में नवजात शिशु से लेकर 16 वर्ष की आयु के बच्चों को स्वर्ण का प्राशन कराया जाता है.
स्वर्णप्राशन ( Suvarna Prashana )
सुवर्ण प्राशन संस्कार
प्राचीन भारतीय परंपरा में सुवर्ण प्राशन संस्कार को मनुष्य के सोलह संस्कारों में प्रमुख संस्कार माना गया था । परंतु आजकल पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण हम इन सब रीति रिवाजों को भूल गए है सुवर्ण एक ऐसा धातु है जिसके निरन्तर ओर सयंमित प्रयोग करते रहने से मनुष्य सदा बुद्धिमान और जवान बना रहता है इसी लिए प्राचीन समय मे बच्चो को स्वर्ण संस्कार करवाया जाता था जिसमे सोने की सलाई से बच्चे को शहद चटवाया जाता था
आयुर्वेद में स्वर्णप्राशन बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है. स्वर्णप्राशन का अर्थ है कि बच्चों को सोना चटाना. बच्चों का सोलह संस्कार किया जाता है जिसमें स्वर्णप्राशन सबसे मुख्य संस्कार है, स्वर्णप्राशन को स्वर्ण बिंदु प्राशन भी कहते हैं. गाय का घी और शहद के मिश्रण के साथ स्वर्ण को मिलाकर बच्चों को दिया जाता है.
तो आइए आज सीखते है सुवर्ण प्राशन बनाने की विधि के बारे में
घटक द्रव्य
शंखपुष्पी , ब्राह्मी , यष्टिमधु ( मुलेठी ) , आंवला , अमृता ( गिलोय ) , बहेड़ा सभी 100 - 100 ग्राम ओर मीठी बच 50 ग्राम
सभी कक दरदरा कूटकर डेढ़ लीटर पानी मे भिगो दें और 12 घण्टे बाद हाथो से अच्छी तरह मसलकर पानी को उबालना शुरू करे और जब उबलते उबलते पानी आधा लीटर रह जाए तब उसको आग से उतार कर सभी औषधियों को निचोड़कर पानी छान लें और ठंडा होने दे ।
दूसरे चरण में देशी गाय का घी 200 ग्राम लेकर उसमे वो आधा लीटर पानी डालकर घी को सिद्ध करे मतलब जब उबलते उबलते पानी घी में से खत्म हो जाए और केवल घी मात्र शेष रहे तब घी को आग से उतारकर ठंडा करके छान लें और ठंडे हुए घी में 400 ग्राम शहद और आधा ग्राम उत्तम क़्वालिटी की स्वर्ण भसम मिलाए ओर सभी को मिलाकर एक जान कर ले और मिश्रण को किसी साफ कांच की बोतल में पैक करके रख ले ।
प्रयोग विधि - जन्म से लेकर सोलह साल तक के बच्चों के लिए इस औषधि को प्रयोग कर सकते है और पुष्य नक्षत्र पर इसलके प्रयोग को बहुत शुभ माना गया है पर शरुआत के 40 से 50 दिन इसका सेवन रोज करवाना चाहिए चार बून्द की मात्रा में उसके बाद हर महीने पुष्य नक्षत्र पर देना चाहिए दस बून्द की मात्रा में । इसका प्रयोग सूर्योदय से पहले खाली पेट करवाना चाहिए और प्रयोग के आधा से एक घण्टे तक कोई भी चीज खाने या पीने के लिए नही देनी चाहिए । मतलब सुबह 4 से 5 बजे के बीच बच्चे को उठाकर उसे सुवर्ण सनसकर करवाकर दुबारा सुला देना चाहिए
नोट - घटक की मात्रा जिस तरह से बताई गई है उसी तरह रखे या उसी अनुपात में कम ज्यादा करे घी और शहद कभी भी सम मात्रा में प्रयोग नही करने चाहिए
जहाँ रोगों को ख़त्म करने के लिए दवाइयों की सलाह दी जाती है तो वहीँ आयुर्वेद में स्वर्णप्राशन की सलाह दी जाती है. स्वर्णप्राशन का सीधा संबंध बच्चों की सेहत से है. स्वर्ण को हमारे शरीर के लिये सबसे श्रेष्ठ धातु माना गया है साथ ही सदियों से ही इसका हमारे जीवन में विशेष महत्व रहा है. स्वर्ण बच्चों के साथ साथ बड़ी उम्र के व्यक्तियों के लिए भी बहुत लाभदायी होता है. ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ने के लिए बहुत अधिक प्रसिद्ध है, अनेक जगह तो स्वर्णप्राशन के दान को सर्वोत्तम दान तक माना जाता है.
स्वर्णप्राशन करने के कारण :
पुराने ज़माने में राजा महाराज सोने के बर्तन में खाते थे, अत्यधिक सोने के आभूषण पहनते थे, इसके पीछे एक कारण होता था और वो कारण था कि सोना कैसे भी करके शरीर के अंदर चला जाये. हमारे पूर्वजों का मानना था कि जब सोने के बर्तन में भोजन किया जाता है तो सोना घिसता हुआ भोजन के साथ ही हमारे शरीर में चला जाता है, जिससे शरीर को सोने के गुण प्राप्त होते है और वो शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढाता है, साथ ही ये हमारे बौधिक और मानसिक स्तर में भी इजाफा लाता है क्योंकि ये ( सोना ) एक तेजपूर्ण धातु है.
स्वर्णप्राशन संस्कार का सही समय
16 संस्कारों में से एक स्वर्णप्राशन का अपना एक अलग महत्व है. अब से तीन चार दशक पहले जब बच्चे का जन्म होता था तब हमारे बुजुर्ग इस संस्कार को अपनाते थे अर्थात सोने या चांदी की धातु से बने बर्तन से बच्चे की जीभ पर शहद लगाते थे. इसी संस्कार को स्वर्णप्राशन कहा जाता है. आज भी असंख्य व्यक्ति इस संस्कार को अपनाते है. लेकिन शहरों में बढ़ते आधुनिकीकरण के कारण वहाँ के लोग हर संस्कार और प्रथा को भूलते जा रहे है. किन्तु स्वर्णप्राशन का सदियों के बाद भी अस्तित्व में रहना उसकी खासियत को दर्शाता है.
सुवर्णप्राशन संस्कार कब और किसको
स्वर्णप्राशन में स्वर्ण के साथ साथ गाय का घी और शहद मिलाया जाता है. इसे बच्चे के जन्म से लेकर पूरी बाल्यवस्था तक चटाना चाहिए, अगर आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो कम से कम छः महीने तक तो नवजात को स्वर्णप्राशन का सेवन अवश्य कराएँ. यदि बच्चे को स्वर्णप्राशन नही करा पाए तो कोई बात नही, बाल्यवस्था 12 साल तक रहती है इस बीच कभी भी स्वर्णप्राशन शुरू कर सकते हैं.
स्वर्णप्राशन से होने वाले लाभ ( Benefits from Suvarna Prashan ) :
स्मरण शक्ति बढ़ाएं ( Increases Memory Power ) : यदि अच्छी तरह बना हुआ स्वर्णप्राशन किसी बालक को कराया जाये तो उसकी स्मरण शक्ति प्रबल रहती है, उसे एक बार का कहा हुआ काफी समय तक याद रह जाता है ऐसे बच्चों को तेजस्वी बच्चों में गिना जाता है.
रोगों से बचाएं ( Protects from Disease ) : बच्चे की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. बच्चे बीमारियों के संपर्क में कम ही आते हैं. स्वर्णप्राशन से बच्चे को शुरू से ही रोगों के प्रभाव से बचाया जा सकता है.
बुद्धिमान बनाएं ( Makes you Intelligent ) : स्वर्णप्राशन से शारीरिक और मानसिक विकास होता है जिसके कारण बच्चे हमेशा के लिए चतुर और बुद्धिमान हो जाते हैं.
स्वर को मीठा बनाये ( Sweeten Throat ) : स्वर्णप्राशन की धातु बच्चे के गले से होकर शरीर में जाती है और सोना गले के स्वर के लिए बहुत फायदेमंद होता है.
शारीरिक क्षमता बढ़ाये ( Increases Physical Strength ) : स्वर्णप्राशन से बच्चों की शारीरिक क्षमता बढ़ती है वह अन्य बच्चों के मुकाबले ज्यादा मजबूत होते हैं.
पाचन तंत्र को स्वस्थ रखे ( Keeps Digestive System Healthy ) : स्वर्णप्राशन का इस्तेमाल करने वाले बच्चों की पाचन क्रिया भी सुचारू रूप से चलती रहती है, उनकी भूख बराबर बनी रहती है, खाना खाने का मन भी करता है और बच्चे नखरे भी नही करते.
चेहरे पर सुन्दरता लाये ( Glow Skin ) : स्वर्णप्राशन करने वाले बच्चों के रंग और रूप में निखार आता है.
स्वर्णप्राशन संस्कार एक बच्चे के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, इससे बच्चे का भविष्य उज्जवल बनता है इसीलिए हर बच्चे का स्वर्णप्राशन अवश्य होना चाहियें. इसके अलावा ये संस्कार निरोगी, कांतिवान और दीर्घायु दाता भी है. लेकिन ध्यान रहें कि स्वर्णप्राशन को अपनाने से पहले किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर या चिकित्सक से सलाह मश्वरा अवश्य ले लें.
अब मैं बात करता हूँ भाई राजीव दीक्षित जी के ज्ञानानुसार जो स्वर्ण भस्म नहीं इंतजाम कर सकते हैं वो अपने बच्चो को नियमित
देशी गौमाता के गव्य उत्पाद का सेवन कराये
पंचगव्य धृत का सेवन कराएं
पंचगव्य नासिका धृत का उपयोग कराये
बच्चो की भरपूर नियमित मालिश,मातृ दुग्ध से भी बच्चो को मजबूत बनाया जा सकता है
क्योंकि इसका उदाहरण मैं मेरे भाई बहन मेरे माता पिता नाना नानी व हमारे सभी रिश्तेदार के वो बच्चे जो हमारी उम्र व मेरे माता पिता नाना नानी दादा दादी वो सभी इन टीकाकरण से कोषों दूर थे फिर भी पूर्णतः स्वस्थ है कारण सिर्फ और सिर्फ एक भरपूर नियमित मालिस मातृ दुग्ध लगभग 2 3 साल की उम्र तक व दूध दही घी मक्खन दाल व शुद्ध आहार
पानी मे रखा सोने की वस्तु कम से कम 4 से 6 घण्टे उस पानी का सेवन करे (खासकर मानसिक रोग से ग्रस्त हेतु रामबाण सिर्फ समय लगेगा धैर्य रखने की जरूरत है)
स्वर्ण भस्म शरीर में क्या काम करता है
स्वर्ण भस्म को बल (शारीरिक, मानसिक, यौन) बढ़ाने के लिए एक टॉनिक की तरह दिया जाता रहा है. यह रसायन, बल्य, ओजवर्धक, और जीर्ण व्याधि को दूर करने में उपयोगी है. स्वर्ण भस्म का सेवन पुराने रोगों को दूर करता है. यह जीर्ण ज्वर(Fever) , खांसी (Cough), दमा (Asthma) , मूत्र विकार (Urinary disorders), अनिद्रा (insomnia), कमजोर पाचन (poor digestion) , मांसपेशियों की कमजोरी (muscle weakness), तपेदिक (tuberculosis), प्रमेह (gonorrhea), रक्ताल्पता (anemia), सूजन (inflammation), अपस्मार(epilepsy),त्वचा रोग(skin disease), सामान्य दुर्बलता(general debility), जैसे अनेक रोगों में उपयोगी है.
स्वर्ण भस्म एक स्वस्थ विकल्प है जोकि आप को यों शक्ति प्रदान करता है इसका आयुर्वेदिक चिकित्सा में सेक्स समस्यों के इलाज के लियें सर्वोपरी स्थान है तथा यह बेहद कमजोर व्यक्ति को भी मज़बूत सेक्स शक्ति प्रदान करता है. यह विशेष रूप से सेक्स कमजोरी और लिंग में बिलकुल भी उतेजना न आने कि समस्या में बहुत अधिक लाभदायक होता है स्वर्ण भस्म भी कार्डियक टॉनिक है जो रक्त शुद्धता और दिल को मजबूत करता है. यह बुद्धि में सुधार, यौन शक्ति बढ़ाने के लिए, और पेट, त्वचा और गुर्दे की गतिविधि को उत्तेजित करता है.
यह एक टॉनिक है जिसका सेवन यौन शक्ति (Sexual power) को बढ़ाता है. स्वर्ण भस्म शरीर से खून की कमी (Anemic) को दूर करता है, पित्त की अधिकता (Excess bile) को कम करता है, हृदय और मस्तिष्क को बल देता है और पुराने रोगों को नष्ट करता है.
स्वर्ण भस्म का वृद्धावस्था में प्रयोग शरीर के सभी अंगों को ताकत देता है.
स्वर्ण भस्म आयुष्य है और बुढ़ापे को दूर करती है. यह भय(Fear) , शोक(Grief), चिंता(anxiety), मानसिक क्षोभ (mental anguish) के कारण हुई वातिक दुर्बलता (pneumatic weakness) को दूर करती है. बुढ़ापे के प्रभाव को दूर करने के लिए स्वर्ण भस्म को मकरध्वज के साथ दिया जाता है.
हृदय की दुर्बलता (Weakness of the heart) में स्वर्ण भस्म का सेवन आंवले के रस अथवा आंवले और अर्जुन की छाल के काढ़े अथवा मक्खन दूध के साथ किया जाता है.
स्वर्ण भस्म से बनी दवाएं पुराने अतिसार(Chronic diarrhea), ग्रहणी (duodenum) , खून की कमी (Blood loss) में बहुत लाभदायक है. शरीर में बहुत तेज बुखार और संक्रामक ज्वरों के बाद होने वाली विकृति को इसके सेवन से नष्ट किया जा सकता है. यदि शरीर में किसी भी प्रकार का विष चला गया हो तो स्वर्ण भस्म को को मधु अथवा आंवले के साथ दिया जाना चाहिए.
प्रमुख उपयोग: यौन दुर्बलता, धातुक्षीणता, नपुंसकता, प्रमेह, स्नायु दुर्बलता, यक्ष्मा/तपेदिक, जीर्ण ज्वर, जीर्ण कास-श्वास, मस्तिष्क दुर्बलता, उन्माद, त्रिदोषज रोग, पित्त रोग
Saturday, August 22, 2020
स्वर्ण भस्म (Gold Ash) स्वर्णप्राशन ( Suvarna Prashana ) कैसे बनती है आयुर्वेदिक गुण और कर्म
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